… क्योंकि दद्दा के नाम से वोट नहीं मिलते

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खेल दिवस पर विशेष

विकास शर्मा

29 अगस्त.. यानि खेल दिवस। बच्चों से सवाल पूछा जाता है कि खेल दिवस क्यों मनाते हैं? जवाब मिलता है कि यह हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जन्मदिवस है। फिर एक सवाल मन में उठता है कि ध्यानचंद जादूगर कैसे हुए ? जवाब मिलता है कि उनसा खिलाड़ी ना कभी हुआ ना कभी होगा।

फिर सवाल उठता है कि खेल दिवस पर क्या करते हैं? जवाब मिलता है कि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को सम्मानित करते हैं। फिर एक नया सवाल सामने आता है कि जिस खिलाड़ी की बराबरी संभव नहीं है, जिसे आपने खेलों का पर्याय मान लिया, जिसके नाम से आप बेहतरीन खिलाड़ियों को सम्मानित करते हैं, उसे देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न के लायक क्यों नहीं समझा जा रहा है? क्या यह उस दिवंगत आत्मा की बेइज्जती नहीं है, जिसके सिर्फ जिक्र से ही नसों में खून का बहाव तेज हो जाता है?

हर साल 29 अगस्त को गाहे-बगाहे कोई-ना-कोई मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग उठाता है और दिन ढलने के साथ-साथ वह आवाज भी ढलने लगती है और फिर अगले साल की 29 अगस्त का इंतजार करने लगती है। क्या हम इतने भावनाशून्य हो गए हैं? या फिर ध्यानचंद का भारत रत्न उनकी मार्केट वैल्यू में अटक कर रह गया है। अगर आईपीएल का आयोजन करना हो तो केंद्र सरकार अरबों के इस आयोजन को देश से बाहर करवाने की अनुमति भी आनन-फानन में दे देती है।

लेकिन खेल जगत के पुरोधा के लिए सरकारों के पास भी समय नहीं है। क्योंकि आईपीएल युवा वर्ग का खेल है, उसके वोट सरकार बनाते-बिगाड़ते हैं। अब हमारे दद्दा (ध्यानचंद) में भला इतना दम कहां, कि वो सरकारों का भविष्य तय कर सकें। इसलिए सरकारों ने ही उनका भविष्य तय कर दिया है कि खेल दिवस मनाओ, प्रतिमा पर फूल चढ़ाओ और भूल जाओ।

बर्लिन की वो कसक

कहते हैं कि 1936 के बर्लिन ओलंपिक के फाइनल में दद्दा ने अपनी पूरी टीम के साथ तिरंगे को सेल्यूट किया था, फिर मैच खेलने उतरे थे। कहीं दिल में कसक थी कि भारत की टीम फिरंगियों के यूनियन जैक के तले खेलने उतर रही है। और उम्मीद थी कि शायद कभी तिरंगे के तले भी ओलंपिक के मैदान में भारतीयों को उतरने का मौका मिलेगा। तिरंगे को सेल्यूट करने के बाद दद्दा की टीम ने भारत को एक और ओलंपिक गोल्ड दिलवा दिया। बाद में भारत आजाद भी हुआ और 1948 में तिरंगे के तले ही पहली बार ओलंपिक हॉकी का गोल्ड मेडल भी जीता। लेकिन 1936 के बर्लिन ओलंपिक में दद्दा के मन में जो कसक थी, वो अब हर उस हिंदुस्तानी के दिल में पिछले 7 दशकों से है कि आखिर उस खिलाड़ी को कब देश का सर्वोच्च सम्मान मिलेगा, जिसने हमें जीतना सिखाया….।

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क्या कहते हैं आंकड़े

  • मेजर ध्यानचंद के नाम पर भारत सरकार लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड तथा अन्य राज्य सरकारें खिलाड़ियों को सम्मान प्रदान करती हैं।
  •  ओलंपिक में 39 अंतरराष्ट्रीय मैचों में 400 और घरेलू मैचों में 1000 से अधिक गोल किए हैं।
  •  दद्दा ध्यानचंद भारत के एकमात्र खिलाड़ी है जिन्होंने लगातार तीन ओलंपिक खेलों में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया।
  •  भारत सरकार ने मेजर ध्यानचंद पर डाक टिकट भी जारी किया हुआ है।
  •  ध्यानचंद की जयंती देश में खेल दिवस के रूप में मनाई जाती है।
  •  जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर और क्रिकेट के जादूगर डॉन ब्रैडमैन भी इनके खेल के मुरीद थे।
  •  1936 के बर्लिन ओलंपिक में मेजर ध्यानचंद फाइनल मैच में अपनी टीम के साथ तिरंगा सेल्यूट करने के बाद मैदान में उतरे थे।
  •  मेजर ध्यानचंद दुनिया के ऐसे खिलाड़ी थे, जिन्होंने ओलंपिक और अंतरराष्ट्रीय करियर में कोई मैच नहीं हारा।
  •  मेजर ध्यानचंद का जन्म इलाहाबाद में हुआ था। इनके भाई रूप सिंह भी देश के महान खिलाड़ी रहे हैं।
  •  1956 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मेजर ध्यानचंद को पदम भूषण से सम्मानित किया था।

सचिन को भी राजनीति में उलझाया

2014 में मेजर ध्यानचंद के नाम की सिफारिश को ठुकराते हुए तत्कालीन यूपीए सरकार ने क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दे दिया था। यह दद्दा के साथ तो अन्याय था ही उस सचिन रमेश तेंदुलकर के साथ भी अनजाने में किया गया एक अन्याय था, जिसने दद्दा के युग के बाद भारतीयों को मुस्कुराने के शायद सबसे ज्यादा मौके दिए हैं। सरकार की उस राजनीतिक पैंतरेबाजी ने सचिन जैसे निच्छल खिलाड़ी के खिलाफ भी लोगों को बोलने का मौका दे दिया, कि दद्दा का हक मार दिया। भारत के खेल इतिहास में दद्दा और सचिन दो ही ऐसे खिलाड़ी माने जा सकते हैं, जिन्हें भारत रत्न दिया जाए। लेकिन राजनीतिक लाभ उठाने की राजनेताओं ने उन दोनों ही नामों को आमने-सामने कर दिया।

नियमों में भी किया गया बदलाव

11 अप्रैल 2011 को भाजपा सांसद मधुसूदन यादव ने केंद्र सरकार से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न दिए जाने के लिए नियमों में बदलाव का आग्रह किया था। तब तक यह सम्मान साहित्य, कला, विज्ञान और जनसेवा के क्षेत्र में दिया जाता था, खिलाड़ियों के लिए भारत के शीर्ष सम्मान खेल रत्न और अर्जुन अवार्ड हैं। इसके बाद सरकार ने भारत रत्न सम्मान के नियमों में बदलाव करते हुए उल्लेखनीय कार्य करने वाले सभी भारतीयों को अवार्ड के योग्य माना जिसमें खेलकूद भी शामिल हो गया। 22 दिसंबर 2011 को इंडियन हॉकी फेडरेशन ने ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की सिफारिश की। आरटीआई से मिली जानकारियों के मुताबिक 2013 में मेजर ध्यानचंद का बायोडेटा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यालय में कई महीने पहले ही पहुंच चुका था। उस पर पीएम की स्वीकृति भी मिल चुकी थी लेकिन बाद में अचानक सचिन के नाम पर मुहर लगा दी गई।

आरटीआई से हुआ खुलासा

सूत्र बताते हैं कि पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल 12 जुलाई 2013 को तत्कालीन खेल मंत्री जितेंद्र सिंह से मिला। और मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की मांग के साथ ध्यानचंद जी का एक बायोडेटा भी उन्हें सौंपा, जिस पर खेल मंत्री से लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक की सहमति रही। अनौपचारिक रूप से कहा गया कि ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा कुछ माह में ही कर दी जाएगी। लेकिन, बाद में आनन-फानन में उनका नाम हटाकर सचिन के नाम का ऐलान कर दिया गया। आरटीआई एक्टिविस्ट और खेल प्रेमी हेमंत दुबे ने मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने से जुड़ी सभी फाइलों की मांग भारत सरकार से की थी। उन दस्तावेजों से ही ये तमाम तथ्य सामने आए हैं।

मोदी सरकार से उम्मीद, लेकिन अभी इंतजार

केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद, जिस तरह से पूरे देश में खेल सुविधाओं में सुधार और खिलाड़ियों के हित की योजनाओं पर अमल शुरू हुआ। उससे एक उम्मीद बंधी थी कि शायद अब मेजर ध्यानचंद को भी देश का सर्वोच्च सम्मान मिल सकता है लेकिन अभी तक भी यह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी है। मोदी सरकार ने पंडित मदन मोहन मालवीय को मरणोपरांत भारत रत्न सम्मान दिया, लेकिन ना जाने क्यों मेजर ध्यानचंद का नाम उनकी नजरों में ही नहीं आया।

फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है। शायद अब सम्मान भी वोट बैंक की कसौटी पर ही कसे जाते हैं। और अगर यह बात सही है तो शायद दद्दा के खेल के दीवानों का इंतजार बहुत लंबा होने वाला है। क्योंकि दद्दा और उनके प्रशंसकों के पास सबकुछ है लेकिन शायद वोट बैंक कम पड़ गया है।


 

 

 

 

 

 

 

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